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  • तीन भोजपुरी ग़ज़ल
  • प्रकाशन :सोमवार, 18 अक्टूबर 2010 , 25 बार पढ़ा गया

    गोबरे गणेश बा इहाँ

    गोबरे गणेश बा इहाँ
    अब उहे विशेष बा इहाँ

    बा कहाँ इहाँ प आदमी
    आदमी के भेष बा इहाँ

    जानवर में प्रेम बा मगर
    आदमी में द्वेष बा इहाँ

    यार तू सम्भल-सम्भल चलs
    डेगे-डेगे ठेस बा इहाँ

    ज़िंदगी अगर हs जेल तs
    हर केहू प केस बा इहाँ

    बा कहाँ प ज़िंदगी ‘मनोज’
    आदमी के रेस बा इहाँ

    सकून के जवाहरात

    केहू के आरजू में दिल हमार बेक़रार बा
    करीं का हम, हमार का, ए दिल प अख़्तियार बा

    सकून के जवाहरात लूट के कहाँ गइल
    ऊ, जे कहत रहल कि तोहसे प्यार बेशुमार बा

    सुहागरात के हसीन याद छू के चल गइल
    बहक रहल बा मन-मयूर, मौसमे-बहार बा

    कहानी अपना ज़िंदगी के कह त देतीं हम, मगर
    कहीं छलक न जाय आँख, पीर बेसम्हार बा

    तमाम उम्र कट गइल अन्हार में त का भइल
    ‘मनोज’ के अभी तलक सुबह के इन्तजार बा

    हम पे कवनों जहर के ना होला असर

    हम पे कवनों ज़हर के ना होला असर
    जब से पियले हईँ आदमी के ज़हर

    काम हो जाई तहरो , बहुत के भइल
    सूंघे-चीखे के परबंध……. बाटे अगर

    लोग सनकाह बन के घूमे रोड पर
    काटे लागेला जब अपने घर, अपने घर

    फूल माला में कइसे गुंथाई भला
    डाल से तूरते जब ऊ जाए बिखर

    बात बोलs कि मुर्दा समय जी उठे
    गीत गावs कि काठो पे होखे असर

    हमरा अँखियन के भाषा समझ लेते ऊ
    जो मुहब्बत के उनका में होइत नज़र

    काश! भावुक कबो हमके ऊहो सुने
    जेकरा ख़ातिर गज़ल कहनीं हम उम्र भर


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