अबकी आए ऐसा नया साल
हो जाए हर गाँव शहर खुशहाल

भइया के मुँह से फूटे संगीत
भौजी के कंगना से खनके ताल

आए रे आए ऐसा मधुमास
फूल खिलाए ठूंठ पेड़ के डाल

झूम-झूम के नाचे मगन किसान
इतना लदरे जौ गेहूँ के बाल

दिन सोना के चाँदी के हो रात
हर अंगना मे ऐसा होए कमाल

मस्ती मे सब गाए मिल के फाग
उड़े प्रेम का ऐसा रंग गुलाल

लौटे रे लौटे गाँवों मे गाँव
फिर से जमे ओ संझा का चौपाल

मनोज भावुक

http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/naya_saal/sets/2006/12_22.htm

 

 

 

– मनोज भावुक

जाने किस की नज़र लगी और रिश्ता टूट गया
तब से खामोशी-खामोशी छाई रहती है
महफिल में भी संग मेरे तनहाई रहती है
बाहर -बाहर घुटन , टूटन अंतर में चलता हैं
लगता है जैसे शब्दों का खंजर चलता है
शब्दों ने खंजर मारा और रिश्ता टूट गया
जाने किस की नज़र लगी और रिश्ता टूट गया

उसका मुझको पता नहीं
पर उसके जैसा मेरा कोई और नहीं था
इसीलिए लगता है कुछ खोया-खोया सा
इसीलिए लगता है कुछ सूना-सूना सा
इसीलिए लगता है कुछ मुरझाये जैसा
और उसे मै लगने लगा पराये जैसा
जाने किस की नज़र लगी और रिश्ता टूट गया

पहले हम दिन रात बहुत बतियाया करते थे
अपने अंतरमन का हाल सुनाया करते थे
अब तो हैलो -हाय नहीं होता है आपस में
जिद्दी मन का ईगो कितना होता है बस में
आँखे नहीं छलकती, ना हीं जुबाँ फिसलती है.
ना ही मै कुछ कह पाऊं ना ओ कुछ कहती है.
फिर भी मुझे सुनाई देतीं हैं कुछ आवाजे
सीले हुए होठों से फड़-फड़ करती सी
या मेरे साँसों के अन्दर से चलती सी
क्या कहती हैं ये आवाजें ?

Tags: