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गज़ल  
फूल के अस्मिता बचावे के
कांट चारो तरफ उगावे के

ए जी ! बाटे बहार गुलशन में
आईं सहरा में गुल खिलावे के

ऊ जे तूफान के बुझा देवे
एगो अइसन दिया जरावे के

एह दशहरा में कवनो पुतला ना
मन के रावण के तन जरावे के

तय कइल ई बहुत जरूरी बा
माथ कहवां ले बा झुकावे के

आईं हियरा के झील में अपना
प्यार के इक कमल खिलावे के

काम अइसन करे के जवना से
पीठ पीछे भी मान पावे के

जिस्म जर जाई एक दिन ‘भावुक’
रूह के रूह से मिलावे के

बात पर बात होता बात ओराते नइखे

मनोज सिंह भावुक की एक रचना अभी कुछ दिन पहले ही हमने यहाँ साझा की थी। भोजपुरी साहित्य के ख्यातिप्राप्त रचनाकार भावुक की प्रस्तुत भोजपुरी ग़ज़ल प्रतियोगिता मे पाँचवें स्थान पर रही है, और प्रतियोगिता को आँचलिक रंग दे रही है।

पुरस्कृत ग़ज़ल: बात पर बात होता बात ओराते नइखे

बात पर बात होता बात ओराते नइखे
कवनो दिक्कत के समाधान भेंटाते नइखे

भोर के आस में जे बूढ़ भइल, सोचत बा
मर गइल का बा सुरुज रात ई जाते नइखे

लोग सिखले बा बजावे के सिरिफ ताली का
सामने जुल्म के अब मुठ्ठी बन्हाते नइखे

कान में खोंट भरल बा तबे तऽ केहू के
कवनो अलचार के आवाज़ सुनाते नइखे

ओद काठी बा, हवा तेज बा,किस्मत देखीं
तेल भरले बा, दिया-बाती बराते नइखे

मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा
भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे

बर्फ हऽ, भाप हऽ, पानी हऽ कि कुछुओ ना हऽ
जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे

दफ्न बा दिल में तजुर्बा त बहुत, ए ‘भावुक’
छंद के बंध में सब काहें समाते नइखे

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बसंत आया, पिया न आए, पता नहीं क्यों जिया जलाये

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सबसे बड़का शाप गरीबी

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कहाँ खो गइल अब ऊ धुन प्यार के

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बाँझ हो गइल बा, संवेदना के गाँव

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पहली कविता (146-165)

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एह दशहरा में कवनो पुतला ना,मन के रावण के तन जरावे के

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बात पर बात होता बात ओराते नइखे

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दीपावली हऽ जिन्दगी, हर साँस हऽ दिया

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उम्र के धूप चढ़ल

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