बसंत आया, पिया न आए, पता नहीं क्यों जिया जलाये
पलाश-सा तन दहक उठा है, कौन विरह की आग बुझाये

हवा बसंती, फ़िज़ा की मस्ती, लहर की कश्ती, बेहोश बस्ती
सभी की लोभी नज़र है मुझपे, सखी रे अब तो ख़ुदा बचाए

पराग महके, पलाश दहके, कोयलिया कुहुके, चुनरिया लहके
पिया अनाड़ी, पिया बेदर्दी, जिया की बतिया समझ न पाए

नज़र मिले तो पता लगाऊं की तेरे मन का मिजाज़ क्या है
मगर कभी तू इधर तो आए नज़र से मेरे नज़र मिलाये

अभी भी लम्बी उदास रातें, कुतर-कुतर के जिया को काटे
असल में ‘भावुक’ खुशी तभी है जो ज़िंदगी में बसंत आए

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http://www.mediakhabaronline.com/topicdetails.aspx?mid=29&tid=2187

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वसंती गीत

सपने हज़ार लेकर आया वसंत राजा
फिर से बहार लेकर आया वसंत राजा

अब ठूंठ में भी फूटे कोंपल नयी वसंती
बरगद का पेड़ बूढा उस पे भी चढ़े मस्ती
माथे पे पीली चुनरी, लहंगा हुआ केसरिया
लह-लह उठे लहरिया,हाय बाली रे उमरिया
ऐसे में मारे कनखी ऋतुराज पालकी से
दुलहन वसुंधरा तब अंखिया झुका ले नीचे
सरसो, कनेर, टेसू ,कचनार, महुआ, मेहंदी
सब जुल्म ढा रहे हैं, सबकी है आज शादी
सोलहो सिंगार लेकर आया वसंत राजा
फिर से बहार लेकर आया वसंत राजा

रंगीन हो रहे हैं सुमनों के गाल कैसे
अब ये न पूछिये की भौरों के हाल कैसे
कच्चे नए टिकोरे बागों में ले हिलोरे
पकने की आस में मन तोता बने अगोरे
अधराती में कोयलिया पंचम में कू-कू कूके
प्रीतम मिलन को तरसत गोरी के दिल में धूके
अमराई है बौराई, बौराया मेरा मन भी
विरहा के आग में अब जलता है मेरा तन भी
कैसा बुखार लेकर आया वसंत राजा
फिर से बहार लेकर आया वसंत राजा

अब मेरा मन भी बहके, अब मेरा तन भी दहके
फागुन का रंग बोले मेरे भी सर पे चढ़ के
मेरे लिए भी कोई खिड़की से आज झांके
यादों में कोई महके, ख्वाबो में कोई चहके
अरमा नए जगे हैं, सपने नए उगे हैं
मादक हुई जवानी टेसू कहीं सुलगे हैं
तू उर्वशी कहाँ है, मै हूँ यहाँ पुरुरवा
आओ रचा लें शादी, बीतें न यूं हीं फगुआ
कैसा खुमार लेकर आया वसंत राजा
फगुनी बयार लेकर आया वसंत राजा
फिर से बहार लेकर आया वसंत राजा

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