वैसे तो मैंने धूल डाल दी है पुरानी यादों पर ……
फिर भी यदा-कदा अन्दर
कुछ तूफ़ान सा चलता रहता है
और काँप जाती हैं मेरे दिल की दीवारें ..
.जी चाहता है, कुछ गुनगुनाऊँ
…मुरझाये फूलों को फिर से खिलाऊँ
…कुछ कहूं तुमसे ..
…. पर फिर दिखने लगती हैं वो गांठे
जो तुम्हारे ऐंठन की वजह से
हमारे बीच की डोर में पड़ गई हैं …
डर लगता है टूट न जाए ……
और खुद ब खुद ठहर जाती है फोन करने वाली उंगलिया ….
तुम भी जानते हो,
फोन नहीं करने का मतलब ये नहीं है कि
मुझे तुम्हारी याद नहीं आती …
पर जहां मेरे लिए स्पेस नहीं हो
अब मै वहाँ नहीं भटकता …
अन्दर हीं अन्दर तड़पना और बात है .

— मनोज भावुक

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