तुम पर गुस्सा भी आता है
और प्यार भी .
कैसे कह दूँ कि तुम मेरी कोई नहीं हो ।

मन करता है कि तुमसे
बोलना छोड़ दूँ ।
….. और बिन बतियाये
रहा भी नहीं जाता ………
कैसे कह दूँ कि तुम मेरी कोई नहीं हो ।

तुमने बहुत जख्म दिये हैं ।
टीसते हैं वो घाव
अब भी अक्सर
पछुआ बहने पर।

कैसे पीया था मैंने उस ज़हर को
तेरे एहसानों के प्याले में ।
कोई और होता तो —-
उसकी तो ………..

तमाम खट्टी- मिठ्ठी यादें समेटे
जी करता है
हमेशा – हमेशा के लिए दूर हो जाऊं तुमसे ।……
………………कभी न बात करूं।
मगर साँसों से कोई पीछा
कैसे छुड़ा सकता है ?

अब तो बंदिशें भी हैं ……
तुमसे मिलने में ,
बतियाने में।

रोकता हूँ खुद को —
पर उसके नाम की जगह
आ जाता है तुम्हारा ही नाम।
बहुत कमीना हो गया हूँ मै।
सनक गया हूँ।

कभी- कभी लगता है,
पागल हो जाऊँगा।
ऐसा रंग गया हूँ
तेरे रंग में।
मगर तुम …..
तुम मेरे रंग में मत रंगना।
बड़े- बुजुर्गों ने सही कहा है
” अगर पता चल जाए कि रंग ‘ घटिया ‘ है तो उसे
फिर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए ” ।
इस्तेमाल!
हाँ, उससे चेहरे का नूर बिगड़ जाता है।
मगर मैंने तो तेरा रंग
दिल पर चढ़ा रखा है।
तू तो चेहरा धो लेगी ।
मगर मै ?