हिंदी कविता

बसंत आया, पिया न आए, पता नहीं क्यों जिया जलाये पलाश-सा तन दहक उठा है, कौन विरह की आग बुझाये हवा बसंती, फ़िज़ा की मस्ती, लहर की कश्ती, बेहोश बस्ती सभी की लोभी नज़र है मुझपे, सखी रे अब तो ख़ुदा बचाए पराग महके, पलाश दहके, कोयलिया कुहुके, चुनरिया लहके पिया अनाड़ी, पिया बेदर्दी, जिया […]

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